Saturday, 24 February 2018

बायीं दीवार

                                                                 
                                                                     

वो कमरें के बायीं दीवार को घण्टों देखती है, और दायीं ओर करवट कर के सो जाती हैं। मैं देखता हूँ , कुछ बूंद तकिये को भींगो रहे होते हैं। वो जिद्दी हैं .. मेरे कई बार पूछने  पर भी वो "कुछ नहीं "कह कर टाल देने की कोशिश करती हैं ....
वह एक रोज काम से जल्दी लौटी और उस दीवार को नीले रंग से रँगने लगी, उसे आसमान का यह रँग पसन्द था। दीवार को रँगते रँगते , एक छोटी बच्ची की तरह उसने अपने चेहरे पर आसमानी रँग के छीटें बिखेर लिये थे। दीवार आसमानी हो चुका था, पर थोड़ी देर बाद उसे निहारते निहारते , वो अचानक उदास होकर बैठ गयी। "कुछ कमी है"  का चित्र उसके चेहरे पर  उभरने लगा । वो उस रात फिर नहीं सोई , और पूरी रात करवटे लेती रही .. आज बेचैनी इस बात की थी की वो उस कमी को ढूंढ क्यों नहीं पा रही जो उसके आसपास ही है और यह जानते हुए भी वो बार बार उससे हार रही ..  मैं चुपचाप उसके बगल में लेटा उसे देखता रहा।अगले दिन काम से जब  घर लौटा तो देखा, वो कमरें में मौजूद हैं, और उस दीवार पर काले रंग से एक उड़ती चिड़िया की तस्वीर बना रही थी, जिसके बगल में एक अधखुला पिंजड़ा पड़ा था। मैंने स्केच लिया और बड़े अक्षर में लिख दिया- USE YOUR WINGS. हम दोनों दीवार को कुछ दूर से निहारने लगे। उसनें मुस्कराते हुये मेरे सीने पर अपना सिर टिका दिया। 
उस रोज वह बायीं ओर करवट कर शुकुन से सोती रही। उसका चेहरा एक जन्म लिये हुये बच्चे की तरह लग रहा था, बिल्कुल शांत और निश्छल। 
वह अब हर रोज उस बायीं दीवार को पोस्टर से घण्टों सजाती हैं, और खुश होती हैं। उसने अब दीवारों पर कवितायेँ लिखनी शुरू कर दी हैं.. वो हर रात सोने से पहले उन कविताओं को  सुनाती हैं... वो कहती हैं.. इसे मैं तुम्हारे लिए नहीं लिखती फिर भी तुम्हे सुनाते वक़्त  यह  कैसे तुम्हारी हो जाती हैं? तुम कोई जादू तो नहीं करते....