Saturday, 28 October 2017

एक टुकड़ा यादों का.

कमरे के एक कोने में पड़े काठ की आलमारी से जब डायरी निकालता हूँ तो जर्द पड़े पन्नो पर फैली नीली स्याही में शब्द मुझे स्मृतियों में उल्टे पाँव ले जाते है। यह बात है, सालो पहले , नवम्बर महीने की जब ठंडी हवाओं ने दस्तक दे दिया था। गुनगुनी धूप सुबह- सुबह सड़को पर फैलती और एक धुंध धरती से ऊपर तैरता दिखता। बस के आखिरी सीट पर बैठ कर सफर हर दिन साथ - साथ किया करते थे। हर स्टॉप पर उतरते- चढ़ते यात्री और हम बेफिक्र किन्ही बातों में खोये हुये भविष्य के लिये कुछ यादें इकठ्टा कर रहे होते थे। लक्ष्मीनगर मेट्रो स्टेशन , गेट नम्बर 2 जहाँ से हम दोनों एक लंबे रात के लिये अलग होते थे। तुमने उस रोज मेरे हाथ मे यह डायरी थमाते हुये कहा था- तुम कविताएं लिखते हो ना, इसलिये यह डायरी तुम्हारे लिये.... हम दोनों हर रोज एक विरह की पीड़ा अनुभव करते जब हम एक जगह से एक दूसरे को अलग करते अपने - अपने घर को लौटने के लिये। मुनिरका की तंग गलियों में एक छोटा सा कमरा , जिसके हर एक कोने में घर की उम्मीद दर्ज थी। जब कभी भी इन उम्मीदों पर कमजोर पड़ता, तुम हाथ थाम लेती। डीटीसी की बस, जब तक हम दोनों को अपने अपने कमरे तक वापस नही पहुंचाती , मोबाईल के मैसेज हम दोनों के बीच कुछ क्षण के लिये उभरे खाली जगह को भर दिया करते थे।
मैं ये अक्सर सोचता था, जिस दिन हम एक दूसरे से नही मिले तो उस दिन को मैं अपने जीवन के किन हिस्सों में लिखूँगा, क्या वह हूबहू लिखना इतना आसान होगा। मैंने इस डायरी में कभी कविता नही लिख सका, इस आखिरी पन्ने में जो आज लिख रहा हूँ, वह स्मृतियों की ढेर का अंतिम टुकड़ा है। अब इस डायरी में लिखने को कुछ भी तो नही बचा। क्या ये सच है?
क्या मुझे नई डायरी ले लेनी चाहिये... नही... क्योकि अब किन यादों को दर्ज करूँगा... जो कुछ छूट गया है,या जिसे जान बूझ कर छोड़ा गया है.. सब कुछ लिख देना जरूरी भी तो नही। जो चालाकी से बचा रखा है, वही तो मुझे मेरे बिस्तर से खींच कर मुझे मेरे कुर्सी तक लाता है और मैं टेबल लैंप के दूधिया रौशनी में सफेद कागज पर लिख रहा होता हूँ एक अ-कविता.. इसी उधेड़बुन में मैंने सिगरेट जला लिया....

Tuesday, 15 August 2017

खामोश कमरा    
अकेलेपन का शोर
बेचैन मन
आज महसुस किया,उसका एक मात्र होना
कमरे का हर कोना भर दिया करता था।
उसकी हंसी , उसकी ख़ामोशी, उसका जिद,
कभी पंखे से टकराती थी, कभी मेज को छूती थी, कभी दिवार के रंगों में घुल जाती थी, तो कभी बाथरूम के नल की टप टप में जा मिलती थी।
उसके न होने से देखो कमरे की दिवार बेरंग है कैसे, नल भी चुपचाप रो लेता है, किचन के बर्तन अब टन टन की आवाज भी नही करते, मेज पर किताबो की ढेर उदास है, कितने दिनों से कोई पन्ने भी नही पलटा, चाय का कप चुहलबाजी नही करता, वो जो हर रोज खिड़कियो पर कबुतर का झुण्ड आ जाया करता था, क्या वो भी एक दूसरे से रुठ गये है।
वो जिद्दी थी, और मैं गैर- जिम्मेदार। हा हमारा प्रेम जिम्मेदारी के बोझ तले नही दबा था। हमने सिर्फ प्रेम किया था, बिना किसी शर्त के।
बेशर्त प्रेम, आह कितनी बड़ी फिलोसोफी उसने दे डाली थी उस दिन। मुझे पसंद था उसके हर कहे शब्दो में डूबना। मैं कई बार नही समझता था, पर मैं कभी उसे नही टोकता क्योकि उसके सब कुछ कह जाने की बेचैनी पर मैं कोई  अवरोध नही बनना चाहता था। वो घण्टो बोलती, मैं घण्टो चुपचाप सुनता। मुझे लिखना पसन्द था, मैं उसके साथ बिताए कई तस्वीरों को शब्द देता था। कई कहानियों में उसके बोलये गये शब्द होते थे। जब वो उन कहानियो को पढ़ती तो कहती ओह्ह तो तुम चोरी करने लगे मेरे शब्दों को । मैं बोलता ये लाइन भी अगली कहानी में डाल दूँगा। वो अपने होठो पर ऊँगली रख कर चुप हो जाने का भाव करती, और मैं अपने होठ उसके होठो पर टिका देता। वो धीरे से अपने ऊँगली  नीचे कर लेती।
कई दिनों से कमरे में पड़ा पड़ा और कमजोर महसूस कर रहा था, सोचा बाहर घूम आऊ।
हवाओँ में ठंडक काफी थी। बुखार और तेज हो सकता था। इसलिये मैंने आवाज देकर चाय मंगवा लिया।
सुबह की बनी चाय है?
नही साब, थोड़ी देर पहले बनाया। हर रोज एक मेम आती है, सो उन्ही के लिये बनाता हूँ।
एक पैकेट सिगरेट लेते आना।
सिगरेट तो मेरे यहाँ खत्म है, चौक पर जाना होगा। 5 रु एक्स्ट्रा लगेगा साब।
ठीक है ले लेना।
ठीक है साब।
मैं चाय को सुड़कने लगा। पांच कदम की दुरी से  लायी गयी यह चाय बिल्कुल ठंडी हो गयी थी। 7 बज रहे थे, अँधेरा जल्दी हो जाता था यहाँ, ऊपर से बर्फबारी। दुकान जल्दी बन्द होना स्वाभाविक था। मैंने सोचा सिगरेट ही जला कर रात काट लूँगा।
लीजिये साब, वो दौड़ कर लाया था, उसकी हाँफती साँसों से साफ साफ पता चल रहा था।
आओ बैठो थोड़ी देर, मैंने पूछा।
नही ठीक है साब , दुकान भी बंद करना है, सो मैं जाता है। वो नेपाली था। इसलिये हूँ और हाँ के प्रयोग में उसे समस्या होती थी।
अच्छा ये लो चॉकलेट खा लो। मैंने सिरहाने पड़े एक चॉकलेट को उसकी ओर बढ़ा दिया.. उसने फौरन उसे जेब मे डाल लिया... 
जब मैं नया नया इस शहर में आया था, तो चाय के सबसे अच्छे स्वाद के लिये यहाँ - वहाँ भटका करता था... 
क्वीन्स कॉलेज के गेट के सामने ही एक चाय वाला हुआ करता था। ऐसा लोग कहते थे की वह चाय में अफीम डालता है। अगर एक बार पी लिये तो फिर उसके चाय की आदत पड़ जाएगी। मैं भी इसी जिज्ञासा से पहुँच गया उस चाय वाले के पास। रविवार के दिन कॉलेज की छुट्टी की वजह से भीड़ नही होती थी, हाँ शाम को जमावड़ा जरूर लगता था। आसपास प्रोफेसर और अधिकारी लोगो का मकान था तो वहाँ बैठ कर मुफ्त ज्ञान लेने के फायदे भी थे। बहस राजनीति से लेकर दर्शनशास्त्र तक के हर छोटे छोटे विषयों को छूती थी। मैं भी अभी अभी राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर के पद पर नियुक्त हुआ था। पास में ही वॉकर स्ट्रीट के कोने पर एक छोटा सा मकान मिल गया था। मेरे मकान से कॉलेज की दुरी 100 कदम थी। उस रविवार को भी हर बार की तरह चाय पीने आ पहुंचा था, बर्फबारी की वजह से चाय वाले ने आसपास प्लास्टिक का एक घेरा बना दिया था। अंदर अंगीठी जल रही थी, सामने एक अधेड़ उम्र की महिला किसी अंग्रेजी किताब में लीन थी। मैंने अंगीठी के पास वाले टेबल पर अपनी जगह ले ली। कोयले की हल्की गर्मी सुखद अनुभूति दे रहा था। चाय को दोनों हथेलियों में पकड़ते हुये एक हल्की चुस्की गले से उतार लिया। महिला ने अपनी जगह बदली और ठीक मेरे सामने वाले टेबल पर आ बैठी, जहाँ से अंगीठी पास थी। एक हाथ को अंगीठी के ऊपर और दूसरे हाथ से चाय का कप पकड़ते हुये हल्की मुस्कराहट से वह मेरी ओर देखी। किताब पास में रखा हुआ था, हल्के ब्लू कवर के ऊपर लिखा था emotions and fear 
By osho. 
आप भी ओशो को पढ़ती है?
जी, "आप भी" मतलब क्या आप भी प.... वो इतना ही बोल पायी थी, की मैं बोल पड़ा..
जी मै भी.. वैसे तो political science  पढ़ाता हूँ पर ओशो को पढ़ने में दिलचस्पी है मुझे।
ओहके.. मैं  लतिका , यहाँ फिलोसोफी की क्लास लेती हूँ और गर्ल्स हॉस्टल की वार्डन भी  हूँ।

ओह्ह , मै नीरव.. मैं पास में ही रहता हूँ, वॉकर स्ट्रीट का आखिरी मकान।

दोनों थोड़े देर के लिये खामोश हो गये थे, हल्के मुस्कुराहट के साथ एक दूसरे के चेहरे को देखते और झट से आँखे नीचे कर के चाय का ग्लास होठो से टिका देते।
वह अपने आसमानी कलर के स्कार्फ़ को हटा कर मेज पर रख दी। अब उसका चेहरा साफ दिख रहा था। ठंड के कारण उसका चेहरा और लाल हो गया था, दाहिने सिर पर एक कटे का निशान था, जिसे वह अपने बालों से ढंकने का प्रयास कर रही थी। उसने अपने बालों का जुड़ा बनाया और फिर स्कार्फ़ गले में लपेट ली। मैं इस बीच दूसरी चाय का आनन्द लेने लगा था। वह चाय वाले को पैसा दी और हल्के मुस्कराहट के साथ विदा ली। वह बेहद खुबसूरत ढंग से चलती थी। उसे क्वीन्स कॉलेज के मेन गेट से अंदर दाखिल होते हुये देख रहा था। 

दोपहर में लंच के समय कॉलेज केन्टीन में आखिरी कोना तलाश रहा था, तभी मेरी नजर लतिका पर पड़ी।
 यहां डोसा अच्छा मिलता है क्या? मैंने ठीक सामने बैठते हुये कहा... 
अरे आप... आइये बैठिये.... आप कुछ लेंगे...

क्रमशः 

Wednesday, 9 August 2017

इंतजार


जब मुड़ कर देखा तो समय बीत चुका था, उस बीते समय में कई लम्हे दुबके हुये थे। पार्क के कोने में प्रेमियो की भीड़ अक्सर अपने अपने लम्हो की रेखा चित्र गढ़ रहे होते थे। वो शर्माते हुये मेरा हाथ खिंचती और इनसे दूर एक और भीड़ की ओर ले जाती, जहाँ बच्चे अपने खिलौनों से बेफिक्र खेल रहे होते, जहाँ स्त्रियों का झुण्ड किस्से- कहानियों में लिप्त होता। वही पड़े बेंच पर वह बैठ जाती। मैं गुस्से में उसकी ओर देखता ... वह चाहती थी हम उन प्रेमियों की भीड़ की तरह ना बन जाये। जो सिर्फ शारीरिक स्पर्श में अपना प्रेम तलाशते है। जो दिल्ली के हर उस कोने की खबर रखते है, जहाँ वह छुप कर आलिंगन भर सके एक दूसरे को।
बेंच पर हाथ पकड़े हम एक दूसरे को मौन में सुन रहे होते। हमारी आँखे आलिंगन कर रही होती। वो मेरे कंधे पर चुपके से सिर टिका देती। हम घण्टों चुप्पी साझा करते हुये एक साथ बैठे रहते।
वक़्त का गुजरना एक बना बनाया नियम है। हम आज साथ नही है। मैं अक्सर उस पार्क में पुराने समय से कुछ लम्हे बीनने आ जाय करता हूँ। आज भी उस बेंच पर ठीक वैसे ही चुप्पी महसूसता हूँ। नये नये प्रेमी जोड़ों का भीड़ नये नये कोने तलाश रहा है। मैं उसी बेंच पर अकेला बैठा तालाब के सूनेपन को निहार रहा होता हूँ, क्योकि अब उसमे एक भी बतख नही है जो पानी के साथ खेले। शाम सरक कर रात की ओर बढ़ता है और मै महसूस करता हूँ अपने कंधे पर एक एहसास, जो आज भी उसके इंतजार में है ।

Tuesday, 8 August 2017

पटेलचेस्ट

लेक्चर समाप्त हो चूका है, क्लास के आखिरी बेंच पर सिर्फ तुम और मैं।
देखो ना क्लास के सन्नाटे में ए सी की हवा भी ज्यादा शोर कर रही है, लड़का कहता है।
लड़की, हां कह कर फिर बेंच पर सर टीका देती है।
तुम कब तक पूंजीवाद, समाजवाद की लड़ाई लड़ते रहोगे, प्रेम का कोई वाद नही होता, लड़की कहती है।

क्यों तुम्हे भी तो ये सब बाते अच्छी लगती थी,जब मैं प्रोफेसर से इन्ही बात पर लड़ता था।आज अगर वाद की लड़ाई न लड़ता तो शायद इस सन्नाटे में हमदोनों नही होते।

पर अपने लिए भी वक़्त निकलना किसी वाद ने नही सिखाया तुम्हे।

लड़का कहता है, नही।

दिल्ली की भागदौड़ तुम्हे शायद कभी पसंद नही आएगी, लड़की मायूस  होकर कहती है।
तुम्हे भी तो मैं हमेशा पसंद नही आता।लड़का मुस्कुरा देता है।

लड़की मोबाइल , कार की चाभी समेटती है, और चलने के लिए उठ पड़ती है।

लड़का मार्क्स का किताब झोले में डालता है, और साथ हो लेता है।

समय एक सा नही रहता, कल तक कोल्डड्रिंक्स अच्छी लग रही थी, अब तो कॉफी पीने को जी चाहता है।

लड़का कहता है, मुझे कल भी चाय अच्छी लगती थी,और आज भी चाय ही पीता हु।
शाम होने को होता है, लड़की कार स्टार्ट करती है, बन्द शीशे से बाय कहती है।
लड़का मुस्कुराकर  कार को जाते हुए देखता रहता है।
सचमुच मुझे दिल्ली में कुछ भी पसंद नही आता तुम्हारे सिवा। लड़का बुदबुदाता है, और चल पड़ता है पटेलचेस्ट की ओर , जहाँ छोटे से कमरे में इंतजार कर रहा होता है, घर की उम्मीद, नए सपने, सिद्धान्त, और एक विचारधारा।

Saturday, 5 August 2017

नवम्बर का महीना


नवम्बर का महीना, सर्द भरी हवा, एक मोटे किताब को सीने से चिपकाये, हल्के हरे ओवरकोट में तुम सीढ़ियों से उतर रही थी। इधर उधर नजर दौड़ायी, पर जब कोई नही दिखा तो मज़बूरी वश तुमने पूछा था-कॉफी पीने चले। तुम्हे इतना पता था की मैं तुम्हारे क्लास का हूँ, और मुझे पता था कि तुम्हारा नाम सोनाली रॉय है। बंगाल के एक जाने माने लॉयर अनिरुद्ध रॉय की इकलौती बेटी हो। लाल रंग की स्कूटी से कॉलेज आती हो और क्लास के अमीरजादे भी उतने ही मरते है, जितना हम जैसे मिडिल क्लास लड़के। जिन्हें सिगरेट , शराब , लड़की, और पार्टी से दूर रहने की नसीहत हर महीने दी जाती है। जिनका एक मात्र सपना होता है, माँ - बाप के सपनो को पूरा करना। और ये तुम जैसी लड़कियो से बात करने से इसलिय हिचकते है क्योकि हाय हैलो के बाद की अंग्रेजी बोलना इन्हें भारी पड़ता है।

तुम रास्ते भर बोलती रही थी और मैं सुनता रहा, क्योकि तुमने मौका नही दिया और मुझे सुनन अच्छा लग रहा था। तुमने मिश्रा सर, नसरीन मैम की बकबक, वीणा मैम की समाचार पढ़ने जैसा लेक्चर और न जाने कितनी कहानियाँ तेजी से सुना गयी थी। और मैं बस मुस्कुराते हुए तुम्हारे चेहरे पर उठते हर भाव को पढ़ रहा था। तुम्हारे होठ के ऊपर  काला तील था, जिसपर मैं कुछ कवितायेँ सोच रहा था, तबतक तुम्हारी कॉफी आ गयी और मेरी चाय।

तुमने पूछा था- तुम कॉफी क्यों नही पीते ?

मैंने मुस्कुराते हुए बोला- चाय की आदत कभी छुटी नही।

तुम यह सुनकर काफी जोर से हँसी थी,
शायरी भी करते हो।

मैं झेप गया।

तुम इतने समय से कुछ भूल रही थी, मेरा नाम पूछना, क्योकि मैं तुम्हारी आवाज में अपने नाम को सुनना चाह रहा था, तुमने तब भी नहीं पूछा था।

हम दोनों उठ कर चल दिये थे, कैंपस से विश्वविद्यालय मेट्रो स्टेशन की ओर...

बात करते करते तुमने कहा था, सज्जाद पता है, मैं अक्सर सपना देखती थी की मैं फोटोग्राफर बनूँगी ।पुरे विश्व् का चक्कर लगाऊ, और सारे खूबसूरत नजारे को अपने कैमरे में कैद कर लू। लेकिन आज मैं मील, मार्क्स और लेनिन की किताबो में उलझी हुई हूँ। कभी जी करता है तो ब्रेख्त को पढ़ लेती हूँ, तो कभी कामू को.. 

हम अक्सर जो चाहते है, वैसा नही होता है और शायद अनिश्चितता ही जीवन को खूबसूरत बनाती है, अक्सर सबकुछ पहले से तय हो तो जिंदगी से रोमांच खत्म हो जायेगा। हम उम्र से पहले बूढ़े हो जायेंगे, जो बस यही सोचते है, अब मरना ही एकमात्र लक्ष्य है।
सज्जाद ,तुम क्या पॉलिटिकल साइंस अपनी मर्जी से चुना ,तुमने पूछा था।

हाँ,मैंने कहा ।
नही कहने का कोई मतलब नही था उससमय।
मैं खुद को बताने  से ज्यादा,तुम्हे जानना चाह रहा था।
और हा, मेरा नाम सज्जाद नही , आदित्य है, आदित्य यादव- मैंने जोर देते हुये कहा।

ओ तो तुम लालू यादव के परिवार से तो नही ?

बिलकुल नही, पता नही क्यों बिहार का हर यादव , लालू यादव का रिश्तेदार लगता है लोगो को।
कुछ पल दोनों चुप हो , कई कदम चल चुके थे। मैंने चुप्पी तोड़ते हुए पूछा था-वैसे ये सज्जाद कौन है?

कोई नही, बस गलती से बोल गयी थी।
तुम्हारे चेहरे के भाव बदल गए थे।

कहाँ रहते हो तुम?
हम बात करते करते मानसरोवर हॉस्टल आ गए थे, मैंने इशारा किया-यही!
मेट्रो स्टेशन पास में ही था, तुम विदा लेने को हाथ बढ़ाई। हाथ पर कई निशान थे।
मैंने पूछा था- ये निशान कैसा?
अरे वो कल कुक नही आयी थी, तो खुद रोटी बनाते वक़्त जल गया । कभी आदत नही है ना।
मैंने हाथ मिलाया, ओवरकोट की गर्मी अब भी तुम्हारे हाथो में थी।
इस खूबसूरत एहसास के साथ मै सो नही पाया था,  सुबह जल्दी तुमसे ढेर सारी बाते करनी थी, क्योकि मैं अक्सर पहली मुलाकात में चुप रह जाता हूँ।
मैं कॉलेज गया था अगले दिन, मेरा चेहरा खुद ब खुद मुस्कुरा रहा था। कॉलेज में इस बात की चर्चा जरूर होने वाली थी, क्योकि हम दोनों को साथ घूमते हुए, क्लास के कई लड़के लड़कियो ने देख लिया था।
एक खूबसूरत इलीट लड़की के साथ अगर मिडिल क्लास लड़का साथ दिख जाये तो लड़के की खुश्किस्मती की चर्चा पुरे क्लास में होती है।
उस दिन तुम नही आयी थी। उस दिन समय का हर सेकण्ड बोझिल लग रहा था। तुमने कॉलेज छोर दिया था।
दो साल बाद दिखी थी, उसी नवम्बर महीने में कनॉट प्लेस के इंडियन कॉफी हाउस के सीढ़ियों से उतरते हुये।
मेरा मन जब भी उदास होता है , मैं निकल पड़ता था, इंडियन कॉफी हाउस। दिल्ली की शोर भरी जगहों में एकमात्र यही जगह थी जहाँ मैं शुकुन से उलझनों को जी सकता था। यहाँ मैं उजले कप में कॉफी और चीनी को चम्मच से घूमता रहता और कल्पनाओ को नई उड़ान देता।
  मैंने अब वक़्त के साथ कॉफी पीना शुरू कर दिया था, चाय की आदत छुट गयी थी। कभी कभी इस नयी बदलाव की वजह तुमको मानता हूँ।
हल्की मुस्कुराहट के साथ तुम मिली थी उस दिन, कोई तुम्हारे साथ था। तुम पहले जैसी चहक नही रही थी। एक चुप्पी थी चेहरे पर- जैसे पुराने कुँए के पानी में होता है, जहां अब औरते पानी लेने नही जाती, अब आसपास चुहलबाजी नही होती, अब वहा बच्चे नही नहाते, अब तो वहा बाल्टी भी नही है।
तुम्हारा इस तरह मिलना मुझे परेशान कर रहा था। इस तरह तुम्हारी मुलाकात मुझे परेशान कर रहा था। तुम बस उदास मुस्कुराहट के साथ मिलोगी और बिना कुछ बात किये सीढ़ियों से उतर जाओगी , ऐसा होना मुझे अंदर तक कचोट रहा था। इसी उधेड़बुन में सीढ़ियां चढ़ते चढ़ते गिरा पर्स मिला- खोलकर देखा तो किसी अंजुमन शेख का था , बुटीक सेंटर , साउथ एक्सटेंशन पता था, दिए हुए नम्बर पर कॉल किया तो स्विच ऑफ था।
तुम्हारे बारे में सोचते सोचते रात के आठ बज गए थे। अचानक याद आया की किसी का पर्स मेरे पास है, जिसमे यही कुछेक बारह सौ रुपये और एक डेबिट कार्ड है । मैंने फिर एक बार कॉल लगाया, इस बार रिंग हो रहा था।
हैलो( एक खूबसूरत आवाज सुनाई दिया)
जी , आपका पर्स इंडियन कॉफी हाउस की सीढ़ियों पर गिरा मिला। आप बताये इसे कहाँ आकर लौटा दूँ।
आदित्य बोल रहे हो( उधर से आवाज आयी)
सोनाली तुम, मैं आश्चर्यचकित था।
कैसी हो तुम और ये अंजुमन शेख का कार्ड? तुम हो कहाँ? तुम  कॉलेज क्यों छोड़ दी थी? मैं सारे सवाल का जबाब जान लेना चाहता था, क्योकि मुझे कल पर भरोसा नही था।
तुमने बस इतना कहा था-कल कॉफी हाउस मिलो 11 बजे।
उस रात फिर नही सो पाया था, कल जल्दी उठकर मिल लेना चाहता था। बहुत से सवाल थे मन में जिसे जल्द से जल्द जान लेना चाहता था। तुमसे बहुत कुछ पूछना था, तुमको बहुत कुछ कहना था।
अगले दिन ,कॉफी हाउस के उजले कप में कॉफी और चीनी को बड़ी तन्मयता से मिला रहा था कि तुम्हे आते हुये देखा..
हल्के हरे रंग की ओवरकोट में, नवम्बर की पहली मुलाकात याद आने लगी। मस्तिष्क हमारी सारी यादो को सहेज कर रखता है। आज पुरानी सारी कड़िया अपने आप जुड़ती चली गयी।
दो साल पहले उस हरे ओवर कोट में सोनाली मिली थी, सपनो के साथ जीने वाली सोनाली, बेरंग जिंदगी में रंग भरने वाली सोनाली। पर दो साल में तुम बदल गयी थी, तुम सोनाली नही थी। तुम एक हताश, उदास, सहमी अंजुमन शेख थी। जिसने दो साल पहले घर छोड़ कर अपने प्रेमी सज्जाद से शादी कर ली थी। वही सज्जाद जिसके बारे में तुमने मुझसे छुपाया था।
आप जिससे प्रेम करो, उसके साथ जिंदगी का हर एक पल जीने को मिले, इससे खूबसूरत और क्या हो सकता है। इस गैरमजहबी प्रेम विवाह में निश्चित ही तूमने बहुत कुछ झेला होगा, पर प्रेम सारे जख्म को भर देता है। पर तुम्हारी इन सब बातो की नही थी, वह थी तुम्हारे और सज्जाद के बिच आये रिश्तों की कड़वाहट की, जो वक़्त के साथ और बद्तर हो रहा था, जहाँ प्रेम एक बस्ते में बन्द हो गया था।
शादी के बाद प्रेम ने बन्धन का रूप ले लिया था। अधिपत्य के बोझ तले रिश्ता बोझिल हो रहे थे।तुम तो विश्व् की चक्कर लगाने वाली लड़की थी, तुम रिश्तों को जीना चाहती थी, ढोना नही। जिसे तुमने प्रेम था, वह घुटन बन गया था, वहा शक ने दरवाजा खट खटा दिया था। 
तुम सब कुछ कहती चली गयी थी और मैं तुम्हारे चेहरे पर उठते हर भाव को वैसे ही पढ़ना चाह रहा था, जैसे पहली दफा पढ़ा था। तुम्हारे आँखों से आँसु टपक रहे थे, जो तुम्हारे होठ के ऊपर बने तील तक पहुँच रहे थे। तुम कुछ हल्का महसूस कर रही थी।
तुमने सज्जाद के लिये नाम बदला था, अपनी कल्पनायें बदली। तुमने खुद को बदल दिया था। प्रेम में बदलना सही है या गलत नही मालूम, पर खुद को बदल कर तुमने प्रेम भी तो नही पाया था।
वक़्त हो गया था फिर एक बार तुम्हारे जाने का, सज्जाद घर पहुचने वाला होगा, तुमने कहा था।
तुम पर्स ली, और हाथ आगे बढ़ाकर बाय कह।
मैंने जल्दी से तुम्हारा हाथ थामा, वही दो साल पुरानी ओवरकोट की गर्मी महसूस करने को। तुम्हारे हाथ के पुराने जख्म भर गए थे, पर नए जख्म ने जगह ले ली थी। पहले के जख्म सज्जाद के लिए था, अब नए जख्म सज्जाद का था।
इस बिच हमारी फोन पर बातें होती रही, राजीव चौक, नेहरू प्लेस पर  दो बार मुलाकात हुयी।
सब कुछ सहज हो रहा था, तुम्हारे जिंदगी में और मैं असहज। इस बिच मैं लिखता रहा था, तुम्हे कवितायेँ भी भेजता था, पढ़कर तूम रोती भी थी, कभी हँसती भी थी।
एक दिन तुम्हारा मेसेज आया था, " मुझसे बात नही हो पायेगी अब।"
मैंने तुरत कॉल बैक किया, मेरा नम्बर ब्लॉक हो चूका था, तुम्हारा फेसबुक अकाउंट चेक किया, डिलीट हो चूका था। मैं घबरा गया था, तुम्हारी साउथ एक्स वाली बुटीक पर फोन किया तो पता चला तुम एक सप्ताह से वहा नही गयी हो। इसी बीच मेरी नई उपन्यास " नवम्बर की डायरी" बाजार में छप कर आ चूका था, मैं सभाओ और गोष्टीओ में जाने में व्यस्त हो गया, पर तुम्हारा ख्याल मन में हमेशा बना रहा।
समय हर दिन करवटे ले रहा था, सूरज रोज डूबता था, रोज उगता था। धीरे धीरे एक साल गुजर गए थे।
शाम के सात बज रहे थे। मैं कमरे में अपनी नयी कहानी "सोना" के बारे में सोच रहा था। उसका अंत समझ नही आ रहा था। कई लाइन लिखता फिर उस पन्ने को फाड़कर फ़ेक देता।
सिगरेट की तलब शुरू हुयी, ड्रावर खोला दो सिगरेट बचे थे। तब तक के लिये काफी था। सिगरेट को जलाया, थोड़ी राहत मिली। फिर लिखने बैठ गया। तब तक दरवाजे की घण्टी बजी, मैंने आखिरी कश को अंदर लिया, फिल्टर को बुझाकर ऐशट्रे में डाल दिया।
दरवाजा खोला तो देखा कोई लड़की मेरी ओर पीठ कर खड़ी है।
मैंने कहा, जी...
वह जैसे ही मुड़ी , मैं आश्चर्यचकित हो गया। वह तुम थी, सोनाली ।
हम दोनों गले से लिपट गये थे। मैंने तुम्हे सीने से लगाये हुए पुछा, तुम्हे मेरा पता कैसे मिला।
तुम्हारी उपन्यास पढ़ी "नवम्बर की डायरी", उसी के पीछे तुम्हारा नम्बर और पता भी था।
आदित्य तुमने सही लिखा है, इस उपन्यास में " जिस रिश्तों में विस्वास की जगह न हो, उसका टूट जाना ही बेहतर है"। मैंने सज्जाद को तलाक दे दिया था। हमारी फ़ेसबुक चैट सज्जाद ने पढ़ लिया था, फिर यही से बचे रिश्ते भी टूटते चले गए थे।
मैंने पूछा, कॉफी बनाऊँ।
नही चाय, कॉफी की आदत छुट गयी अब, तुमने कहा।
मैंने तुम्हारे लिये चाय बनाया और खुद के लिये कॉफी।
तुम कॉफी कब से पीने लगे?
तुम्हारे मुलाकात के बाद से।
तुम हँस दी थी। बदलाव प्रेम में सहज हो तो वही शुभ होता है।
तुम मेरे अस्त व्यस्त घर को देख रही थी, अस्त व्यस्त सिर्फ घर ही नही था, मैं भी था। जिसे तुम्हे सजाना और सवारना था, पता नही तुम इसके लिए तैयार थी या नही।
तभी तुमने कहा, ये किताबे इतनी बिखरी हुयी क्यों है, मैं सजा दूँ। मैं मुस्कुरा दिया।
घडी के नौ बज गए थे, हम दोनों किचेन में डिनर तैयार कर रहे थे। तुमने कहा खिड़की बन्द कर दो, सर्द भरी हवा आ रही।
मैंने महसूस किया, नवम्बर का महीना  आ चुका था।

Friday, 4 August 2017

नाम क्या है तुम्हारा?


नारेबाजी की बढ़ती आवाज में उसने चिल्ला कर पूछ लिया ,नाम क्या है तुम्हारा?
क्या ?
नाम नाम !
मैं नाम बताने जा ही रहा था तबतक पीछे से भीड़ की धक्कामुकि में उसने मेरी पांच उंगलियो के बिच में अपनी उंगलियो को फसा कर नारेबाजी शुरू कर दी।
छात्रो की भीड़ ITO से शास्त्री भवन की ओर बढ़ रही थी। सफ़र लंबा था, भीड़ जितनी धक्का देती उसकी पकड़ मेरी उंगलियो के बिच उतनी ही तेज हो जाती। एक हाथ को हवा में उठा कर चीखती हुई ललकार रही थी, सरकार के विरुद्ध रौद्र रूप था उसका।पर ऊपर से सख्त उतनी ही अंदर से कोमल सी लगी।
कौन सी पार्टी से हो? उसने पूछा
किसी से भी नही!
कौन से यूनिवर्सिटी से हो?
दिल्ली, दिल्ली यूनिवर्सिटी, मैंने उसकी पकड़ को और मजबूत करते हुये कहा।
ह्म्म्म्म्म्म की आवाज के साथ वो फिर नारेबाजी शुरू कर दी।
मै भी हाथ को पकड़े उसके आवाज में आवाज मिला रहा था।
बिच रास्ते में बैरिकेड था।छात्रो की भीड़ उसे तोड़ने की कोशिश कर रही थी।चन्द पल के लिए मैं अपने आप को हीरो, उसे हीरोइन और पुलिस को उसका पिता समझने लगा।पुलिस की भीड़ छात्रो को पकड़ पकड़ बस में ठूसने लगी।अफरा तफरी मचने लगा। मेरे हाथ से उसका हाथ छुट चूका था।तबतक भीड़ में गुम हो गयी वो
,बार बार भीड़ में सुनने की कोशिश करता रहा, उसकी आवाज, पर नाकामयाब था।
हम सरकार से जीत चुके थे, पर मैं फिर भी हारे मन से वापस लौट रहा था। उसकी उंगलियों की पकड़ अब भी अपने उंगलियों में महसूस कर रहा था। उसकी आवाज अब भी कानो में गूंज रही थी।
मेरा मन उसके जाने का अफ़सोस से उठे खीज और उसके "नाम क्या है तुम्हारा" जैसे सवालो से उठे मुस्कराहट के बीच तैर रहा था।
गौरव गुप्ता

कैसे हो तुम?



जब तुमने वर्षो बाद मैसेज कर के पूछा था, कि कैसे हो तुम? मैं घण्टो निहारता रहा था मोबाइल स्क्रीन। शायद ये सवाल सहज हो तुम्हारे लिये,लेकिन मेरे लिये इसका उत्तर दे पाना बहुत कठिन था । समझ नही पा रहा था कि क्या कहूँ।
क्या मेरा यह कह देना की मैं बिल्कुल ठीक हूँ, खुद से झूठ बोलना नही होगा। या यह कह देना की " मैं तुम्हारे बिना कैसे ठीक रह सकता हूँ" मेरे अहंकार को चोट पहुचाने जैसा नही होगा।
मै घुट रहा था।तुम्हारे सवाल से नही, खुद के ढूंढे गये जबाब से...ऐसा पहली दफा था जब खुद के ढूंढे गये जबाब, खुद से नये सवाल पैदा कर रहे थे। यह सवाल जबाब का गुणात्मक प्रकिया मेरे गले के बीचों बीच अटका पड़ा था। मैं फेफड़ो में साँसे भरने की बार बार कोशिश करने लगा। तुम्हारे पूछे गए सवाल , और मेरे जबाब- हमारे रिश्ते को नया जन्म दे सकती है " ऐसी सम्भावनाओ से मैं जितना आशान्वित था उतना ही डरा हुआ भी कि " मेरे किसी जबाब से" यह आखिरी संवाद न बन कर रह जाये। फिर कही अफ़सोस मुझे पूरी जिंदगी ना चिढ़ाये। 
मैं रिश्तों की शुरुआत जितनी कम अक़्ली से शुरू करता हूं, उस रिश्ते को बचाने में अपनी पूरी तरकीबे लगा देता हूँ। क्योकि मैं किसी भी रिश्ते को इतनी आसानी से नही जाने देता, क्योकि मैं अकेलेपन से डरता हूँ। पर पहली दफा तुमने हराया था मुझे किसी रिश्ते में सालों पहले, मेरे गलतियों को बिना बताये जाना कितना आसान था ना तुम्हारे लिये? तुमने मुझे इतना वक़्त भी नही दिया कि मैं समझ पाऊँ एक छोटी सी वजह।

खैर, इस घुटन से बाहर आने की जल्दी में, मैंने कमरे की खिड़कियों दरवाजे को खोल देना उचित समझा।पर कोई हवा इस कमरे में क्यूँ नही आ रही? कमरे के इस सन्नाटे में, मैं अपनी धड़कनों को साफ साफ सुन पा रहा था। मैं अपने अंदर के शोर को छुपाने के लिये कमरे के खालीपन को सांसों से भर लेना चाहा। और फिर इस खालीपन को किसी और तरकीब से भरने की कोशिश करने लगा। मैंने पास पड़े सिगरेट को जला लिया और मोबाइल में लिख लिख कर मिटाने लगा... ठीक हूँ, नही नही.... मैं बिलकुल अच्छा हूँ... नही ... तुम कैसी हो.... ओह्ह ये भी नही... hi जैसे कई शब्द उँगलियो और कीपैड के बीच जगह बना रहे थे। मैं कुछ और लिखना चाह रहा था, यह "कुछ और " मेरे कंठ के बीचों बीच अटका था। मैं कमरे के एक कोने में पड़े हुए कुर्सी पर जा कर बैठ गया। मैंने सोचा ये सवाल क्या तुमने भी अपने अंदर इतनी ही बेचैनी महसूस करते हुये पूछा होगा। तुम्हारी सहज तस्वीर उभर आयी, जिसमे तुम मुस्करा रही थी। मैं चिढ गया... मैं तुम्हे परेशान देखना चाहता था.. तुम्हारी मुस्कुराहट, तुम्हारी सहजता जो मुझे आकर्षित करती थी, अब उसी से चिढ़ने लगा। जानता हूँ, कई बुराईयो ने मेरे अंदर जगह बना लिया है, वह जगह जहाँ तुम्हारी मौजूदगी हमेशा होती थी। कोई जगह कभी खाली नही रहता, तुम्हारे जाने से , जन्म लिए उस खाली स्थान को भरने वाले कई चीजें आसपास मौजूद थी। और मैंने कभी उन्हें रोका नही... एक चिढ़, बेचैनी, उदासी, सिगरेट की कश, शराब की घुंट, अहंकार, नीरसता, सब वक़्त- बवक्त दरवाजा खटखटाते रहते है..
सिगरेट का कश लेते हुये अंततः मैंने तुम्हारे उस सवाल का कोई जबाब नही देने का सोचा। सिगरेट की आग फिल्टर के जितना करीब जा रही थी मैं उतना ही खुद को ठंडा महसुस करने लगा। मैं अब और असहज नही होना चाहता था, थक कर मैंने उस बोझ को हमेशा खत्म कर देने का चुनाव किया। मैंने तुम्हारा नम्बर ब्लॉक कर दिया था।
©गौरव गुप्ता

कशमकश


सिगरेट के कश को फेफड़ो में भर लेता हूँ, क्योकि इस खालीपन को भरने का एक मात्र जरिया है, जिसे मेरे इस हालात में पसन्द है मुझे। बन्द अँधेरे कमरे में एक शुकून मिल रहा मुझे। अब खिड़की के छोटे छेद से आती रौशनी शरीर को भेदती हुई मालूम पड़ रही।
मैं खुद से दूर भाग रहा, और जब मैं खुद से दूर भाग रहा होऊ तो वहाँ तुम्हारा ठहरना भी ठीक नही।
ये क्या , अपनी उंगलियों को मेरे शरीर पर मत फेरो। नही इसका वजन मैं नही सह पा रहा। हटा लो। कुछ दूर चली जाओ....
इस कमरे से बाहर... हाँ मैंने कहा इस कमरे से बाहर...
इस कमरे में तुम्हारी उपस्तिथि से उभरे प्रेम में मुझे एक गंध महसूस हो रहा, जो मेरा गला घोंट रहा है।
मेरे कविताओं के पन्नो की ओर नजर मत दौड़ाओ... इस वक़्त न मैं कविता लिखना चाहता हूँ, न पढ़ना..और न सोचना, क्योकि इस हालात में मैं कविताओं का गला नही घोटना चाहता, ना पढ़ कर ना लिख कर। हाँ मैं अजीब हो गया हूँ, बहुत अजीब...
मैं तुमसे ही नही, खुद की कैद से भी आजाद हो जाना चाहता हूँ। क्योकि तुम्हारी अपेक्षाओं की तरह मेरा वजूद मुझसे अपेक्षाये करने लगा है।
मैं , मैं तो हूँ ही नही कही... बस एक हाड़ मांस का इंसान जो बचपन से अब तक दुनिया की अपेक्षाये पूरा कर रहा। वह प्रेम करते करते , जिम्मेवारी को भी अपने सिर पर ओढ़ ले रहा...
हाँ, मैं भाग रहा- खुद से, तुमसे, इस बोझिल समाज से, और तब तक भागूँगा जब तक मैं थककर चूर चूर न हो जाऊ, जब तक सारी अपेक्षाये खुद अपना दम न घोंट ले.. और एक दिन रुई के फाहे की तरह उड़ जाऊ हवाओँ के साथ..
(डायरी- पेज 7) 


                                                  

डायरी

मैंने सारा प्रयोजन कर रखा था.. घर का सबसे अंधेरा कोना ढूंढ लिया.. उस अंधेरे कोने में एक टेबल को दीवार की ओट से लगा दिया। एक पुरानी काठ की कुर्सी लेते आया। टेबल पर पड़े सारे गैर साहित्यिक पुस्तको को अलमीरा में रखा, और आलमीरा से साहित्यिक किताबो को चुन- चुन कर टेबल पर तह लगाता गया। घर के स्टोर रूम में पड़े , धूल फांकते लैंप को साफ किया, पेंदी में किरासन तेल भरा.. और उसके जलते ही अंधेरे कमरे में हल्की पीली रौशनी को धीरे - धीरे फैलता देखने लगा। नही अब भी मैं "ठीक- ठीक" नही महसूस कर पा रहा.. सामने बन्द खिड़की को खोलना चाहा, सोचा उससे पहले एक कप चाय बना लु... दराज में गोल्ड फ्लैक का डिब्बा खाली था... कल दिन भर बारिश हो रही थी..इसलिये बाजार नही जा सका... जीवन मे किसी चीज की आदत हो जाये तो उसकी वास्तविक अनुपस्थिति भी उसके उपस्थित होने का भ्रम पैदा करती है, जैसा मैं सिगरेट का फिल्टर अपने होठों के बीच फंसा हुआ महसूस कर रहा था।
... चाय तैयार थी.. उसके एक घूँट को हलक से उतरते ही कुछ अच्छा सा महसूस हुआ.. मैं जानता था यह "कुछ अच्छा सा" थोड़ी देर के लिये था, क्योकि कप के पेंदी तक चाय पहुंचते ही सारी की सारी व्यवस्था ठीक वैसे ही हो जाने वाला था, यह घोषित डर था मेरा.. मैंने खिड़की खोल दिया, सफेद बेली की महक बड़ी तेजी से कमरे में फैल गयी.. याद ओर हवा ये दोनों रिक्त स्थान को तेजी से भरते है..
मैं सारे प्रयोजन के समाप्त होते ही, शब्द देने की उत्सुकता में जल्द कुर्सी पर जा बैठा। सफेद कागज पर नीले रंग के शब्द रँगने लगा। पर उभरते चित्र ठीक -ठीक नही थे। सारे शब्द ठीक वही पुराने थे, जैसे यह भी इसी प्रयोजन का हिस्सा हो। इन सारे कोशिशों के बावजूद मैं असफल था।
पूरी रात गुजर गयी.. कागज उसी अधूरे शब्दो के साथ शांत पड़े थे। लैंप की रौशनी अपने खो जाने की घोषणा कर रहे थे। मैं उस रात कुछ नही लिख पाया.. मैंने मुस्कराकर, लैंप बुझाया... कागज को अधूरे शब्दो के साथ ही कूड़ेदान में डाल दिया... कमरा बन्द कर.. बाजार की ओर निकल गया दूध का पैकेट खरीदने.. सुबह सुबह चाय की आदत थी... दुकानदार को दूध का पैकेट लेकर , उसे सिक्के गिन गिन कर थमा रहा था.. नही मैं सिक्के नही गिन रहा था, आप विश्वास नही करेंगे.. मैं उस वक़्त सचमुच कविताएं लिख रहा था....


                                                     

मैंने उसे ठीक -ठीक नही देखा ...


मैं खाली डिब्बे में क्या तलाशता हूँ.. अपना सुख .. नही अपना दुःख..
कितना अजीब है ना जब हम किसी चीज को जी रहे होते है तो उसके होने का ठीक ठीक एहसास कभी नही होता.. और वो बीत जाता है.. पर दुःख के साथ ऐसा नही है वो समानांतर चलती है इसलिये हमारी आँखे ठीक ठीक महसूस कर रही होती है.. मुझे उसका चेहरा ठीक ठीक याद नही.. वो जब भी साथ होती थी.. मैंने उसे कभी ठीक से नही देखा.. जैसे आप अपने कमरे में सालो से रहते है पर आपने कभी गौर से उसके हर एक कोने को नही देखा.. आप हर रात जिस बिस्तर पर सोते है.. उसको ठीक ठीक छू कर महसूस नही किया , आपने चादर के हर उलझे रेशों पर कभी गौर नही किया .. आपने फर्श की ठंडक को कभी महसूस नही किया.. चाय की हर घूंट कब हलक से उतर गई हमे एहसास तक नही हुआ, हम अपने जिंदगी में जीये गये हिस्सो में अधिकांश समय यंत्रवत होते है। हमने कभी रुक कर, ठहर कर कभी देखने की कोशिश नही की.. हम क्या जी रहे ? हम किसे जी रहे ?
आँखे बंद कर के मुझे उसका कोई चेहरा याद नही आ पाता, कितना अजीब है ना वो मेरी प्रेमिका थी। हमनें कितनी सड़को पर साथ साथ चले.. कितने सूरज को साथ साथ डूबते देखा.. बारिश की बूंदों में ना जाने कितनी बार साथ साथ भींगे.. ये "साथ -साथ " एक रहस्यमयी शब्द है.. जिसका ठीक - ठीक कोई स्केल नही.. क्या हम अपने अपने हिस्से की जिंदगी जी रहे थे ? नही नही मैं उसपर संदेह नही कर रहा.. उसे पता हो मेरे सिर के बाएं तरफ कटे का निशान है.. बचपन मे खेलते वक़्त किसी ने लकड़ी के छोटे टुकड़े से घाव कर दिया था, माँ बहुत रोई थी.. मुझे गोद में लेकर सड़को पर भाग रही थी.. पिता जी शहर से बाहर थे.. मैं बेहोश नही था , पर मैं होश में भी नही था.. यह ठीक ऐसी अवस्था है जब हम ठीक ठीक प्रतिक्रिया देना नही आता।
क्या मैंने अपने को उसके सामने ठीक - ठीक रख दिया था। क्या उसने भी सारी कहानियाँ मुझे सुनाई होगी। जब हम साथ थे, हमने ढेरों बातें की थी... इन बातों की ढ़ेर मैं कुछ टटोल रहा हूँ.. दुःख या सुख .. ठीक - ठीक पता नही..
बुखार से शरीर तप रहा, डॉक्टर ने कहा।
मुझे इतना याद है। माँ सिरहाने बैठी है, पिता जी आज शहर से फिर बाहर है। दरवाजे पर कोई खड़ा है जिसे मैं ठीक - ठीक नही देख पा रहा , वो बिल्कुल वैसे ही जैसे मैं जब भी उसे याद करने की कोशिश करता हूँ... कुछ धुँधला सा नजर आता है.. वो नही हो सकती.. वो जिद्दी थी.. मुझसे भी ज्यादा...
मैं कोशिश कर रहा आँख खोलने की.. वो धुँधला सा चेहरा अब भी वहीं खड़ा है। दिल के ठीक पास एक घना धुंध की तरह दर्द उठा..जो दिल के ठीक आसपास कही काफी देर से बैठा था.. एक घना उलझा हुआ , बिल्कुल ठोस भी नही ना ही बिल्कुल तरल भी नही... कोई धुंध सा था .. जिसमे एक बोझ था.. ठीक ठीक आकार नही पता .. जब हमे ठीक - ठीक पता नही होता तो हम उसे एक गोले आकार की परिकल्पना कर लेते है... आँख से कुछ बूंद लुढ़क कर तकिये को भिंगोने लगे.. चेहरा नजर आने ही वाला था कि मैंने आँखे बंद कर लेना चाहा इस अफसोस में की मैंने उसे ठीक- ठीक नही देखा कभी...


गाँव याद आता है मुझे



दूर कुँए का निर्मल पानी, वो पीपल की छाँव रे
कितना प्यारा है, हमारा गाँव रे...


गाँव की कल्पना कुआँ , पीपल का पेड़, दालान, चबूतरा, आम की खुशबू, दोपहर की सूनी धूल उड़ाती सड़के, शाम को खाट पर बैठे बड़े-बुजुर्गो की महफ़िल, कहकहे, ठहाकों के बिना अधूरी मालुम पड़ती है। गाँव की कल्पना इस रूप में होना स्वाभाविक है, क्योकि जब भी मैंने अपने गाँव को देखा, इसी रूप में देखा।
आज मुझे कृत्रिम बिजली से रौशन बल्ब से भी ना मिटने वाला अँधेरा, शहरो में पसरा दिखता है, तो वही याद आता है गाँव के दुआर पर जल रहे एक लालटेन की,जो पुरे टोला , मोहल्ला को रौशन कर रहा होता था।
जब दिल्ली आया तो देखा, कुकुरमुत्ते की तरह फ़ैलते, बढ़ते मकानों को , जो मुर्गे की दरबे की तरह दीखते है, जहाँ आपका दरवाजा सिर्फ आपके लिए खुलता और बन्द होता है।
मैंने गाँव के कई घरो में दरवाजा नही देखा, शायद उन्हें इसकी जरूरत नही थी, वही छोटे शहरों में लोहे की ग्रिल ने जगह ले ली, जिसे लोग सुन्दर ढांचे में ढालकर अपने आप को उसके अंदर बन्द कर देते है। गाँव के हर घर का अपना दुआर हुआ करता था, जिसका जितना बड़ा दुआर, उसकी गाँव में उतनी शाख।
ठण्ड के दिनों में हर दुआर पर घुरा फुँका जाता था। घुरा फूंकने का मतलब , धान के फसल से निकले पुआल को जलाया जाना होता था। जो जल्द ही जल कर बुझ जाता था, लेकिन लोग उसी राख को फूँक फूँक कर राख में गर्मी बनाये रखते थे। यह "घुरा" बड़े- बुजुर्ग से लेकर युवाओ के लिए बतकही का अड्डा हुआ करता था, जहाँ लोग देश- दुनिया से लेकर टोला- मोहल्ला का सामान्य ज्ञान बांटा करते थे। जब राख की ढेर की गर्मी बिल्कुल ख़त्म होती तो, वह कुत्ते के सोने का विस्तर हुआ करता था।

शहर में कमरे की ठंडक कृत्रिम हीटर से चली तो जाती है, पर वह वैसा आनन्द नही दे पाता, जिसे गाँव के लोग बुझते राख में भी टटोल टटोल कर लेते थे।
गाँव के हर घर के दुआर पर मड़ई हुआ करता था। एक मड़ई पडोस के दुआर के मड़ई से बिल्कुल सटा होता था, जिससे आप अपने मड़ई में सोये सोये बगल वाले पडोसी से बातचीत कर सकते थे। गाँव के कई कहानियो से वाकिफ हो गया था, जब भी पिता जी के साथ सोता था और वो पड़ोस के मोईन चाचा से बात करते।
सुबह जगने के लिए मोबाइल के अलार्म की जरूरत नही होती थी, बैल के गले की घंटी से निकलती टुनटुन , मुर्गे की बांग्, या पडोसी के झुमर, बिरहा के बोल ही जगा दिया करते थे।
आज शहरों की मोटी दीवारो में आवाज सोखने की शक्ति है, फिर भी सड़को पर चीख पुकार मचा रहता है, उसी समय याद आता है, गाँव की दूर तक फैली शांति।

जब गाँव की पगडंडियों को लांघते, लांघते दूर खेतो में निकल जाते तो कोल्हू मशीन से आती आवाज, एक अलग आनन्द से भर देती। ईख के मौसम में, किसी खेत से ईंख उखाड़ा, छिला , चबाया और रस से भरे मुँह लिए निकल पड़ा अगले पड़ाव की ओर।
देखते देखते समय बीता, पलायन एक मज़बूरी बन कर उभरी या यूँ कहे हम कमजोर निकले जो गाँव में रह सकने की हिम्मत नही जुटा पाये।
आज दिल्ली की भागती- दौड़ती जिंदगी रोज देखता हूँ, रोज गालियाँ देता हूँ इस भाग दौड़ की जिंदगी को, फिर आ जाता हूँ मुनिरका की तंग गलियों में, हाँफते हुए तीन मंजिल चढ़ता हूँ, दरवाजा खुलते ही बेतहाशा पड़ जाता हू बिस्तर पर।
हर रात पत्नी को कहता हूँ, चले गाँव की ओर..
पत्नी माथे को चूमती है और कहती है- तुम हिम्मत बाँधो और मैं बैग बाँधती हूँ.. 5 साल का आरव भागा आता है, अपने छोटे से बैग को लेकर और कहता है" पापा अभी चले"...

आज खत आया है, गाँव से... अंत में माँ ने पूछा है- कब आ रहे?
पत्नी टिकट लिये खड़ी है, आरव छोटे से बैग में अपने खिलौने पैक कर रहा..
और मेरी आँखों से आँसू छलक कर भींगो रहे है.. माँ की चिठ्ठी।

                                                              

प्रिय लतिका...


मैं मोबाइल कीपैड पर लिख लिख कर बैकस्पेस दबाता जा रहा था। जो कुछ लिखता वो सब कुछ मिट जाता , सोचता हूँ जब तुम्हे खत लिखा करता था तो कितनी दफा लिख कर काट देता, पन्ने बदल देता, नये शब्दो को चुनता, कुछ यादें बुनता... पर वो सारे शब्द बेकार पड़े होते थे, पर कभी मिटते नही। उन मासूम से शब्दो को पढ़ कर हंसता कि अच्छा हुआ जो खत तुम्हे भेजा वो यह नही था। वरना तुम भी कहती अलग होने के बाद भी मैं क्यूँ अपने जले दाल का जिक्र कर रहा, क्यूँ अपने लेट उठने पर खुद को कोस रहा। चाय के कप फिर टूट गये, लापरवाह मैं, आज नल खुला छोड़ ऑफिस निकल गया। अंततः एक अच्छा सा पत्र लिखता जिसमे बस पूछता की तुम कैसी हो? अपना ख्याल रखना। ना तुम पूछती की मैं कैसा हूँ, ना मैं कहता की " मैं ठीक नही हूँ , लतिका"। मैं कैसे ठीक रह सकता हूँ, तुम्हारे बिना। ये घर, ये खिड़कियां, ये दरवाजे, सोफा, कुशन, पर्दे सब उदास है... सब के सब। इन सब पर जब तुम अपने नर्म हाथ फेरती , ये खिलखिला कर कैसे हंस दिया करते थे।
जानता हूँ, तुम फिर कहोगी वक़्त सब कुछ बदल देगा "नीरव".. थोड़ा वक़्त दो। पर मैं जानता हूँ, वक़्त खुद तो बदल जा रहा पर कुछ भी नही बदल रहा। वक़्त हर दिन धोखे में रख रहा मुझे। जब उस सुबह किचन से बर्तन के टकराहट की आवाज नही आयी थी तो मैं दौड़ कर भागा था... रूम से बालकनी, बालकनी से रूम ...यु ही भागता फिर रहा था। वही बेचैनी , वही टीस आजतक महसूस करता हूँ, जैसा पहली दफा तुमसे बिछड़ने पर किया था।
मोबाईल के समय में भी मुझे खत लिखना पसन्द था। जब स्याही पन्नो को रंग रही होती है तो एक अजीब सा शुकून मिलता है। मैं एक एक शब्दो में अपने प्यार को दर्ज कर रहा होता हूँ। ताकि, जब तुम इसे पढ़ो तो शायद तुम भी ठीक वैसा ही महसूस करो, जैसा मैं कर रहा होता हूँ। हां ,शायद यह मेरा स्वार्थ है, क्योकि मैं चाहता हूँ तुम वापस लौटो और हौले से कहो- नीरव कुछ भी नही बदला। मैं आँखे खोलू और पाऊँ तुम्हारे घुटने पर खुद को पड़ा हुआ। तुम मेरे बालों को सहलाते हुये कहो- चाय पिओगे।
लतिका, लतिका, लतिका.....ओह्ह
मैं अपने कीपैड पर यह क्या टाइप करने लगा........
बैकस्पेस... कुछ भी नही बचा...
स्क्रीन पर फिर सुनापन छा गया, ठीक इस घर की तरह...ठीक मेरे जिंदगी की तरह..... फिर एक उदासीपन ... मुझसे इस मोबाइल पर कुछ भी नही लिखा जायेगा।
तुम ठीक कहती थी, मैं आधुनिक शरीर में पुरानी आत्मा हूँ।
यह सोच कर मै खत लिखने बैठ गया.....
प्रिय लतिका...

परछाई

परछाई


मुझे मेरे परछाई से शिकायत है,वह मेरी ठीक ठीक आकृति नही बनाती। वह कभी मेरे कद से छोटा तो कभी मेरे कद से बड़ा तो कभी कभी मेरे दोनों पैरों के इर्द गिर्द एक गोला घेरा बना लिया करती है। मैं उससे छुपने के लिये पेड़ो की ओट में चला जाता हूँ तो कभी दीवारों का सहारा लेता हूँ। नजर घुमा कर देखता हूँ वो मेरे सहारा को मुझसे जोड़ कर एक नई आकृति गढ़ रही होती है। मैं भागता हूँ, बेतहाशा, उससे कोसो दूर निकल जाना चाहता हूँ, पर उसकी जिद मेरे पैरों में लिपटी हुई मिलती है।
मैंने उससे कई बार कहा, ठीक ठीक हिसाब क्यूँ नही लगा लेती, तुम मुझे ठीक वैसा ही क्यूँ नही पेश करती, जैसा मैं हूँ। वो कुछ नही बोली, कभी नही बोली, चुप चाप मेरी आकृतियां बनाती रही।
मैं एक दिन गुस्से से घर से नही निकला। मैं खुश था कि आज उससे मुलाकात नही होगी। तभी खिड़की से झांकती रौशनी का एक टुकड़ा मेरे शरीर से आ लगा। पलट कर देखा तो परछाई , दिवार पर एक आकृति लिये हुये। अचानक मैं उसके करीब जाने लगा, और करीब, जितना करीब गया वो गायब होने लगी। मेरे अंदर एक अजीब से टीस उठी, उसके खो जाने का। मैं समझ नही पा रहा था, जिससे मैं इतने दिनों से भागता रहा, उसके दूर जाने पर मुझे खुश होना चाहिये, पर ऐसा नही था। मेरे चेहरे पर दुःख की रेखाये उभर आई, एक गहन उदासी घिरने लगा था।
मुझे लगने लगा, मैंने किसी को खो दिया। "क्या मैं उससे प्यार करने लगा हूँ?" जैसे ख्याल अपनी जगह बनाने लगे थे। मैं गुणा भाग नही करना चाहता था, मुझे महसूस हुआ, उसका जिद्दीपन मुझे अच्छा लगने लगा है,और मेरा भागना , खुद से भागना है। मैं फुट फुट कर रोने लगा... बिल्कुल एक बच्चे की तरह... मैं अक्सर बच्चे की तरह रोना चाहता हूँ.. मैं अपने अंदर किसी बोझ को स्थान नही देना चाहता। मैं बिलकुल खाली हो जाना चाहता था, उस रोज...