खामोश कमरा
अकेलेपन का शोर
बेचैन मन
अकेलेपन का शोर
बेचैन मन
आज महसुस किया,उसका एक मात्र होना
कमरे का हर कोना भर दिया करता था।
उसकी हंसी , उसकी ख़ामोशी, उसका जिद,
कभी पंखे से टकराती थी, कभी मेज को छूती थी, कभी दिवार के रंगों में घुल जाती थी, तो कभी बाथरूम के नल की टप टप में जा मिलती थी।
कमरे का हर कोना भर दिया करता था।
उसकी हंसी , उसकी ख़ामोशी, उसका जिद,
कभी पंखे से टकराती थी, कभी मेज को छूती थी, कभी दिवार के रंगों में घुल जाती थी, तो कभी बाथरूम के नल की टप टप में जा मिलती थी।
उसके न होने से देखो कमरे की दिवार बेरंग है कैसे, नल भी चुपचाप रो लेता है, किचन के बर्तन अब टन टन की आवाज भी नही करते, मेज पर किताबो की ढेर उदास है, कितने दिनों से कोई पन्ने भी नही पलटा, चाय का कप चुहलबाजी नही करता, वो जो हर रोज खिड़कियो पर कबुतर का झुण्ड आ जाया करता था, क्या वो भी एक दूसरे से रुठ गये है।
वो जिद्दी थी, और मैं गैर- जिम्मेदार। हा हमारा प्रेम जिम्मेदारी के बोझ तले नही दबा था। हमने सिर्फ प्रेम किया था, बिना किसी शर्त के।
बेशर्त प्रेम, आह कितनी बड़ी फिलोसोफी उसने दे डाली थी उस दिन। मुझे पसंद था उसके हर कहे शब्दो में डूबना। मैं कई बार नही समझता था, पर मैं कभी उसे नही टोकता क्योकि उसके सब कुछ कह जाने की बेचैनी पर मैं कोई अवरोध नही बनना चाहता था। वो घण्टो बोलती, मैं घण्टो चुपचाप सुनता। मुझे लिखना पसन्द था, मैं उसके साथ बिताए कई तस्वीरों को शब्द देता था। कई कहानियों में उसके बोलये गये शब्द होते थे। जब वो उन कहानियो को पढ़ती तो कहती ओह्ह तो तुम चोरी करने लगे मेरे शब्दों को । मैं बोलता ये लाइन भी अगली कहानी में डाल दूँगा। वो अपने होठो पर ऊँगली रख कर चुप हो जाने का भाव करती, और मैं अपने होठ उसके होठो पर टिका देता। वो धीरे से अपने ऊँगली नीचे कर लेती।
कई दिनों से कमरे में पड़ा पड़ा और कमजोर महसूस कर रहा था, सोचा बाहर घूम आऊ।
हवाओँ में ठंडक काफी थी। बुखार और तेज हो सकता था। इसलिये मैंने आवाज देकर चाय मंगवा लिया।
हवाओँ में ठंडक काफी थी। बुखार और तेज हो सकता था। इसलिये मैंने आवाज देकर चाय मंगवा लिया।
सुबह की बनी चाय है?
नही साब, थोड़ी देर पहले बनाया। हर रोज एक मेम आती है, सो उन्ही के लिये बनाता हूँ।
नही साब, थोड़ी देर पहले बनाया। हर रोज एक मेम आती है, सो उन्ही के लिये बनाता हूँ।
एक पैकेट सिगरेट लेते आना।
सिगरेट तो मेरे यहाँ खत्म है, चौक पर जाना होगा। 5 रु एक्स्ट्रा लगेगा साब।
ठीक है ले लेना।
ठीक है साब।
ठीक है साब।
मैं चाय को सुड़कने लगा। पांच कदम की दुरी से लायी गयी यह चाय बिल्कुल ठंडी हो गयी थी। 7 बज रहे थे, अँधेरा जल्दी हो जाता था यहाँ, ऊपर से बर्फबारी। दुकान जल्दी बन्द होना स्वाभाविक था। मैंने सोचा सिगरेट ही जला कर रात काट लूँगा।
लीजिये साब, वो दौड़ कर लाया था, उसकी हाँफती साँसों से साफ साफ पता चल रहा था।
आओ बैठो थोड़ी देर, मैंने पूछा।
नही ठीक है साब , दुकान भी बंद करना है, सो मैं जाता है। वो नेपाली था। इसलिये हूँ और हाँ के प्रयोग में उसे समस्या होती थी।
अच्छा ये लो चॉकलेट खा लो। मैंने सिरहाने पड़े एक चॉकलेट को उसकी ओर बढ़ा दिया.. उसने फौरन उसे जेब मे डाल लिया...
जब मैं नया नया इस शहर में आया था, तो चाय के सबसे अच्छे स्वाद के लिये यहाँ - वहाँ भटका करता था...
क्वीन्स कॉलेज के गेट के सामने ही एक चाय वाला हुआ करता था। ऐसा लोग कहते थे की वह चाय में अफीम डालता है। अगर एक बार पी लिये तो फिर उसके चाय की आदत पड़ जाएगी। मैं भी इसी जिज्ञासा से पहुँच गया उस चाय वाले के पास। रविवार के दिन कॉलेज की छुट्टी की वजह से भीड़ नही होती थी, हाँ शाम को जमावड़ा जरूर लगता था। आसपास प्रोफेसर और अधिकारी लोगो का मकान था तो वहाँ बैठ कर मुफ्त ज्ञान लेने के फायदे भी थे। बहस राजनीति से लेकर दर्शनशास्त्र तक के हर छोटे छोटे विषयों को छूती थी। मैं भी अभी अभी राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर के पद पर नियुक्त हुआ था। पास में ही वॉकर स्ट्रीट के कोने पर एक छोटा सा मकान मिल गया था। मेरे मकान से कॉलेज की दुरी 100 कदम थी। उस रविवार को भी हर बार की तरह चाय पीने आ पहुंचा था, बर्फबारी की वजह से चाय वाले ने आसपास प्लास्टिक का एक घेरा बना दिया था। अंदर अंगीठी जल रही थी, सामने एक अधेड़ उम्र की महिला किसी अंग्रेजी किताब में लीन थी। मैंने अंगीठी के पास वाले टेबल पर अपनी जगह ले ली। कोयले की हल्की गर्मी सुखद अनुभूति दे रहा था। चाय को दोनों हथेलियों में पकड़ते हुये एक हल्की चुस्की गले से उतार लिया। महिला ने अपनी जगह बदली और ठीक मेरे सामने वाले टेबल पर आ बैठी, जहाँ से अंगीठी पास थी। एक हाथ को अंगीठी के ऊपर और दूसरे हाथ से चाय का कप पकड़ते हुये हल्की मुस्कराहट से वह मेरी ओर देखी। किताब पास में रखा हुआ था, हल्के ब्लू कवर के ऊपर लिखा था emotions and fear
By osho.
आप भी ओशो को पढ़ती है?
जी, "आप भी" मतलब क्या आप भी प.... वो इतना ही बोल पायी थी, की मैं बोल पड़ा..
जी मै भी.. वैसे तो political science पढ़ाता हूँ पर ओशो को पढ़ने में दिलचस्पी है मुझे।
ओहके.. मैं लतिका , यहाँ फिलोसोफी की क्लास लेती हूँ और गर्ल्स हॉस्टल की वार्डन भी हूँ।
ओह्ह , मै नीरव.. मैं पास में ही रहता हूँ, वॉकर स्ट्रीट का आखिरी मकान।
दोनों थोड़े देर के लिये खामोश हो गये थे, हल्के मुस्कुराहट के साथ एक दूसरे के चेहरे को देखते और झट से आँखे नीचे कर के चाय का ग्लास होठो से टिका देते।
वह अपने आसमानी कलर के स्कार्फ़ को हटा कर मेज पर रख दी। अब उसका चेहरा साफ दिख रहा था। ठंड के कारण उसका चेहरा और लाल हो गया था, दाहिने सिर पर एक कटे का निशान था, जिसे वह अपने बालों से ढंकने का प्रयास कर रही थी। उसने अपने बालों का जुड़ा बनाया और फिर स्कार्फ़ गले में लपेट ली। मैं इस बीच दूसरी चाय का आनन्द लेने लगा था। वह चाय वाले को पैसा दी और हल्के मुस्कराहट के साथ विदा ली। वह बेहद खुबसूरत ढंग से चलती थी। उसे क्वीन्स कॉलेज के मेन गेट से अंदर दाखिल होते हुये देख रहा था।
दोपहर में लंच के समय कॉलेज केन्टीन में आखिरी कोना तलाश रहा था, तभी मेरी नजर लतिका पर पड़ी।
यहां डोसा अच्छा मिलता है क्या? मैंने ठीक सामने बैठते हुये कहा...
अरे आप... आइये बैठिये.... आप कुछ लेंगे...
क्रमशः






