कमरे के एक कोने में पड़े काठ की आलमारी से जब डायरी निकालता हूँ तो जर्द पड़े पन्नो पर फैली नीली स्याही में शब्द मुझे स्मृतियों में उल्टे पाँव ले जाते है। यह बात है, सालो पहले , नवम्बर महीने की जब ठंडी हवाओं ने दस्तक दे दिया था। गुनगुनी धूप सुबह- सुबह सड़को पर फैलती और एक धुंध धरती से ऊपर तैरता दिखता। बस के आखिरी सीट पर बैठ कर सफर हर दिन साथ - साथ किया करते थे। हर स्टॉप पर उतरते- चढ़ते यात्री और हम बेफिक्र किन्ही बातों में खोये हुये भविष्य के लिये कुछ यादें इकठ्टा कर रहे होते थे। लक्ष्मीनगर मेट्रो स्टेशन , गेट नम्बर 2 जहाँ से हम दोनों एक लंबे रात के लिये अलग होते थे। तुमने उस रोज मेरे हाथ मे यह डायरी थमाते हुये कहा था- तुम कविताएं लिखते हो ना, इसलिये यह डायरी तुम्हारे लिये.... हम दोनों हर रोज एक विरह की पीड़ा अनुभव करते जब हम एक जगह से एक दूसरे को अलग करते अपने - अपने घर को लौटने के लिये। मुनिरका की तंग गलियों में एक छोटा सा कमरा , जिसके हर एक कोने में घर की उम्मीद दर्ज थी। जब कभी भी इन उम्मीदों पर कमजोर पड़ता, तुम हाथ थाम लेती। डीटीसी की बस, जब तक हम दोनों को अपने अपने कमरे तक वापस नही पहुंचाती , मोबाईल के मैसेज हम दोनों के बीच कुछ क्षण के लिये उभरे खाली जगह को भर दिया करते थे।
मैं ये अक्सर सोचता था, जिस दिन हम एक दूसरे से नही मिले तो उस दिन को मैं अपने जीवन के किन हिस्सों में लिखूँगा, क्या वह हूबहू लिखना इतना आसान होगा। मैंने इस डायरी में कभी कविता नही लिख सका, इस आखिरी पन्ने में जो आज लिख रहा हूँ, वह स्मृतियों की ढेर का अंतिम टुकड़ा है। अब इस डायरी में लिखने को कुछ भी तो नही बचा। क्या ये सच है?
क्या मुझे नई डायरी ले लेनी चाहिये... नही... क्योकि अब किन यादों को दर्ज करूँगा... जो कुछ छूट गया है,या जिसे जान बूझ कर छोड़ा गया है.. सब कुछ लिख देना जरूरी भी तो नही। जो चालाकी से बचा रखा है, वही तो मुझे मेरे बिस्तर से खींच कर मुझे मेरे कुर्सी तक लाता है और मैं टेबल लैंप के दूधिया रौशनी में सफेद कागज पर लिख रहा होता हूँ एक अ-कविता.. इसी उधेड़बुन में मैंने सिगरेट जला लिया....
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