मैंने सारा प्रयोजन कर रखा था.. घर का सबसे अंधेरा कोना ढूंढ लिया.. उस अंधेरे कोने में एक टेबल को दीवार की ओट से लगा दिया। एक पुरानी काठ की कुर्सी लेते आया। टेबल पर पड़े सारे गैर साहित्यिक पुस्तको को अलमीरा में रखा, और आलमीरा से साहित्यिक किताबो को चुन- चुन कर टेबल पर तह लगाता गया। घर के स्टोर रूम में पड़े , धूल फांकते लैंप को साफ किया, पेंदी में किरासन तेल भरा.. और उसके जलते ही अंधेरे कमरे में हल्की पीली रौशनी को धीरे - धीरे फैलता देखने लगा। नही अब भी मैं "ठीक- ठीक" नही महसूस कर पा रहा.. सामने बन्द खिड़की को खोलना चाहा, सोचा उससे पहले एक कप चाय बना लु... दराज में गोल्ड फ्लैक का डिब्बा खाली था... कल दिन भर बारिश हो रही थी..इसलिये बाजार नही जा सका... जीवन मे किसी चीज की आदत हो जाये तो उसकी वास्तविक अनुपस्थिति भी उसके उपस्थित होने का भ्रम पैदा करती है, जैसा मैं सिगरेट का फिल्टर अपने होठों के बीच फंसा हुआ महसूस कर रहा था।
... चाय तैयार थी.. उसके एक घूँट को हलक से उतरते ही कुछ अच्छा सा महसूस हुआ.. मैं जानता था यह "कुछ अच्छा सा" थोड़ी देर के लिये था, क्योकि कप के पेंदी तक चाय पहुंचते ही सारी की सारी व्यवस्था ठीक वैसे ही हो जाने वाला था, यह घोषित डर था मेरा.. मैंने खिड़की खोल दिया, सफेद बेली की महक बड़ी तेजी से कमरे में फैल गयी.. याद ओर हवा ये दोनों रिक्त स्थान को तेजी से भरते है..
मैं सारे प्रयोजन के समाप्त होते ही, शब्द देने की उत्सुकता में जल्द कुर्सी पर जा बैठा। सफेद कागज पर नीले रंग के शब्द रँगने लगा। पर उभरते चित्र ठीक -ठीक नही थे। सारे शब्द ठीक वही पुराने थे, जैसे यह भी इसी प्रयोजन का हिस्सा हो। इन सारे कोशिशों के बावजूद मैं असफल था।
पूरी रात गुजर गयी.. कागज उसी अधूरे शब्दो के साथ शांत पड़े थे। लैंप की रौशनी अपने खो जाने की घोषणा कर रहे थे। मैं उस रात कुछ नही लिख पाया.. मैंने मुस्कराकर, लैंप बुझाया... कागज को अधूरे शब्दो के साथ ही कूड़ेदान में डाल दिया... कमरा बन्द कर.. बाजार की ओर निकल गया दूध का पैकेट खरीदने.. सुबह सुबह चाय की आदत थी... दुकानदार को दूध का पैकेट लेकर , उसे सिक्के गिन गिन कर थमा रहा था.. नही मैं सिक्के नही गिन रहा था, आप विश्वास नही करेंगे.. मैं उस वक़्त सचमुच कविताएं लिख रहा था....
... चाय तैयार थी.. उसके एक घूँट को हलक से उतरते ही कुछ अच्छा सा महसूस हुआ.. मैं जानता था यह "कुछ अच्छा सा" थोड़ी देर के लिये था, क्योकि कप के पेंदी तक चाय पहुंचते ही सारी की सारी व्यवस्था ठीक वैसे ही हो जाने वाला था, यह घोषित डर था मेरा.. मैंने खिड़की खोल दिया, सफेद बेली की महक बड़ी तेजी से कमरे में फैल गयी.. याद ओर हवा ये दोनों रिक्त स्थान को तेजी से भरते है..
मैं सारे प्रयोजन के समाप्त होते ही, शब्द देने की उत्सुकता में जल्द कुर्सी पर जा बैठा। सफेद कागज पर नीले रंग के शब्द रँगने लगा। पर उभरते चित्र ठीक -ठीक नही थे। सारे शब्द ठीक वही पुराने थे, जैसे यह भी इसी प्रयोजन का हिस्सा हो। इन सारे कोशिशों के बावजूद मैं असफल था।
पूरी रात गुजर गयी.. कागज उसी अधूरे शब्दो के साथ शांत पड़े थे। लैंप की रौशनी अपने खो जाने की घोषणा कर रहे थे। मैं उस रात कुछ नही लिख पाया.. मैंने मुस्कराकर, लैंप बुझाया... कागज को अधूरे शब्दो के साथ ही कूड़ेदान में डाल दिया... कमरा बन्द कर.. बाजार की ओर निकल गया दूध का पैकेट खरीदने.. सुबह सुबह चाय की आदत थी... दुकानदार को दूध का पैकेट लेकर , उसे सिक्के गिन गिन कर थमा रहा था.. नही मैं सिक्के नही गिन रहा था, आप विश्वास नही करेंगे.. मैं उस वक़्त सचमुच कविताएं लिख रहा था....

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