मैं खाली डिब्बे में क्या तलाशता हूँ.. अपना सुख .. नही अपना दुःख..
कितना अजीब है ना जब हम किसी चीज को जी रहे होते है तो उसके होने का ठीक ठीक एहसास कभी नही होता.. और वो बीत जाता है.. पर दुःख के साथ ऐसा नही है वो समानांतर चलती है इसलिये हमारी आँखे ठीक ठीक महसूस कर रही होती है.. मुझे उसका चेहरा ठीक ठीक याद नही.. वो जब भी साथ होती थी.. मैंने उसे कभी ठीक से नही देखा.. जैसे आप अपने कमरे में सालो से रहते है पर आपने कभी गौर से उसके हर एक कोने को नही देखा.. आप हर रात जिस बिस्तर पर सोते है.. उसको ठीक ठीक छू कर महसूस नही किया , आपने चादर के हर उलझे रेशों पर कभी गौर नही किया .. आपने फर्श की ठंडक को कभी महसूस नही किया.. चाय की हर घूंट कब हलक से उतर गई हमे एहसास तक नही हुआ, हम अपने जिंदगी में जीये गये हिस्सो में अधिकांश समय यंत्रवत होते है। हमने कभी रुक कर, ठहर कर कभी देखने की कोशिश नही की.. हम क्या जी रहे ? हम किसे जी रहे ?
आँखे बंद कर के मुझे उसका कोई चेहरा याद नही आ पाता, कितना अजीब है ना वो मेरी प्रेमिका थी। हमनें कितनी सड़को पर साथ साथ चले.. कितने सूरज को साथ साथ डूबते देखा.. बारिश की बूंदों में ना जाने कितनी बार साथ साथ भींगे.. ये "साथ -साथ " एक रहस्यमयी शब्द है.. जिसका ठीक - ठीक कोई स्केल नही.. क्या हम अपने अपने हिस्से की जिंदगी जी रहे थे ? नही नही मैं उसपर संदेह नही कर रहा.. उसे पता हो मेरे सिर के बाएं तरफ कटे का निशान है.. बचपन मे खेलते वक़्त किसी ने लकड़ी के छोटे टुकड़े से घाव कर दिया था, माँ बहुत रोई थी.. मुझे गोद में लेकर सड़को पर भाग रही थी.. पिता जी शहर से बाहर थे.. मैं बेहोश नही था , पर मैं होश में भी नही था.. यह ठीक ऐसी अवस्था है जब हम ठीक ठीक प्रतिक्रिया देना नही आता।
क्या मैंने अपने को उसके सामने ठीक - ठीक रख दिया था। क्या उसने भी सारी कहानियाँ मुझे सुनाई होगी। जब हम साथ थे, हमने ढेरों बातें की थी... इन बातों की ढ़ेर मैं कुछ टटोल रहा हूँ.. दुःख या सुख .. ठीक - ठीक पता नही..
बुखार से शरीर तप रहा, डॉक्टर ने कहा।
मुझे इतना याद है। माँ सिरहाने बैठी है, पिता जी आज शहर से फिर बाहर है। दरवाजे पर कोई खड़ा है जिसे मैं ठीक - ठीक नही देख पा रहा , वो बिल्कुल वैसे ही जैसे मैं जब भी उसे याद करने की कोशिश करता हूँ... कुछ धुँधला सा नजर आता है.. वो नही हो सकती.. वो जिद्दी थी.. मुझसे भी ज्यादा...
मैं कोशिश कर रहा आँख खोलने की.. वो धुँधला सा चेहरा अब भी वहीं खड़ा है। दिल के ठीक पास एक घना धुंध की तरह दर्द उठा..जो दिल के ठीक आसपास कही काफी देर से बैठा था.. एक घना उलझा हुआ , बिल्कुल ठोस भी नही ना ही बिल्कुल तरल भी नही... कोई धुंध सा था .. जिसमे एक बोझ था.. ठीक ठीक आकार नही पता .. जब हमे ठीक - ठीक पता नही होता तो हम उसे एक गोले आकार की परिकल्पना कर लेते है... आँख से कुछ बूंद लुढ़क कर तकिये को भिंगोने लगे.. चेहरा नजर आने ही वाला था कि मैंने आँखे बंद कर लेना चाहा इस अफसोस में की मैंने उसे ठीक- ठीक नही देखा कभी...

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