जब मुड़ कर देखा तो समय बीत चुका था, उस बीते समय में कई लम्हे दुबके हुये थे। पार्क के कोने में प्रेमियो की भीड़ अक्सर अपने अपने लम्हो की रेखा चित्र गढ़ रहे होते थे। वो शर्माते हुये मेरा हाथ खिंचती और इनसे दूर एक और भीड़ की ओर ले जाती, जहाँ बच्चे अपने खिलौनों से बेफिक्र खेल रहे होते, जहाँ स्त्रियों का झुण्ड किस्से- कहानियों में लिप्त होता। वही पड़े बेंच पर वह बैठ जाती। मैं गुस्से में उसकी ओर देखता ... वह चाहती थी हम उन प्रेमियों की भीड़ की तरह ना बन जाये। जो सिर्फ शारीरिक स्पर्श में अपना प्रेम तलाशते है। जो दिल्ली के हर उस कोने की खबर रखते है, जहाँ वह छुप कर आलिंगन भर सके एक दूसरे को।
बेंच पर हाथ पकड़े हम एक दूसरे को मौन में सुन रहे होते। हमारी आँखे आलिंगन कर रही होती। वो मेरे कंधे पर चुपके से सिर टिका देती। हम घण्टों चुप्पी साझा करते हुये एक साथ बैठे रहते।
वक़्त का गुजरना एक बना बनाया नियम है। हम आज साथ नही है। मैं अक्सर उस पार्क में पुराने समय से कुछ लम्हे बीनने आ जाय करता हूँ। आज भी उस बेंच पर ठीक वैसे ही चुप्पी महसूसता हूँ। नये नये प्रेमी जोड़ों का भीड़ नये नये कोने तलाश रहा है। मैं उसी बेंच पर अकेला बैठा तालाब के सूनेपन को निहार रहा होता हूँ, क्योकि अब उसमे एक भी बतख नही है जो पानी के साथ खेले। शाम सरक कर रात की ओर बढ़ता है और मै महसूस करता हूँ अपने कंधे पर एक एहसास, जो आज भी उसके इंतजार में है ।

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