Friday, 4 August 2017

परछाई

परछाई


मुझे मेरे परछाई से शिकायत है,वह मेरी ठीक ठीक आकृति नही बनाती। वह कभी मेरे कद से छोटा तो कभी मेरे कद से बड़ा तो कभी कभी मेरे दोनों पैरों के इर्द गिर्द एक गोला घेरा बना लिया करती है। मैं उससे छुपने के लिये पेड़ो की ओट में चला जाता हूँ तो कभी दीवारों का सहारा लेता हूँ। नजर घुमा कर देखता हूँ वो मेरे सहारा को मुझसे जोड़ कर एक नई आकृति गढ़ रही होती है। मैं भागता हूँ, बेतहाशा, उससे कोसो दूर निकल जाना चाहता हूँ, पर उसकी जिद मेरे पैरों में लिपटी हुई मिलती है।
मैंने उससे कई बार कहा, ठीक ठीक हिसाब क्यूँ नही लगा लेती, तुम मुझे ठीक वैसा ही क्यूँ नही पेश करती, जैसा मैं हूँ। वो कुछ नही बोली, कभी नही बोली, चुप चाप मेरी आकृतियां बनाती रही।
मैं एक दिन गुस्से से घर से नही निकला। मैं खुश था कि आज उससे मुलाकात नही होगी। तभी खिड़की से झांकती रौशनी का एक टुकड़ा मेरे शरीर से आ लगा। पलट कर देखा तो परछाई , दिवार पर एक आकृति लिये हुये। अचानक मैं उसके करीब जाने लगा, और करीब, जितना करीब गया वो गायब होने लगी। मेरे अंदर एक अजीब से टीस उठी, उसके खो जाने का। मैं समझ नही पा रहा था, जिससे मैं इतने दिनों से भागता रहा, उसके दूर जाने पर मुझे खुश होना चाहिये, पर ऐसा नही था। मेरे चेहरे पर दुःख की रेखाये उभर आई, एक गहन उदासी घिरने लगा था।
मुझे लगने लगा, मैंने किसी को खो दिया। "क्या मैं उससे प्यार करने लगा हूँ?" जैसे ख्याल अपनी जगह बनाने लगे थे। मैं गुणा भाग नही करना चाहता था, मुझे महसूस हुआ, उसका जिद्दीपन मुझे अच्छा लगने लगा है,और मेरा भागना , खुद से भागना है। मैं फुट फुट कर रोने लगा... बिल्कुल एक बच्चे की तरह... मैं अक्सर बच्चे की तरह रोना चाहता हूँ.. मैं अपने अंदर किसी बोझ को स्थान नही देना चाहता। मैं बिलकुल खाली हो जाना चाहता था, उस रोज...

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