जब तुमने वर्षो बाद मैसेज कर के पूछा था, कि कैसे हो तुम? मैं घण्टो निहारता रहा था मोबाइल स्क्रीन। शायद ये सवाल सहज हो तुम्हारे लिये,लेकिन मेरे लिये इसका उत्तर दे पाना बहुत कठिन था । समझ नही पा रहा था कि क्या कहूँ।
क्या मेरा यह कह देना की मैं बिल्कुल ठीक हूँ, खुद से झूठ बोलना नही होगा। या यह कह देना की " मैं तुम्हारे बिना कैसे ठीक रह सकता हूँ" मेरे अहंकार को चोट पहुचाने जैसा नही होगा।
मै घुट रहा था।तुम्हारे सवाल से नही, खुद के ढूंढे गये जबाब से...ऐसा पहली दफा था जब खुद के ढूंढे गये जबाब, खुद से नये सवाल पैदा कर रहे थे। यह सवाल जबाब का गुणात्मक प्रकिया मेरे गले के बीचों बीच अटका पड़ा था। मैं फेफड़ो में साँसे भरने की बार बार कोशिश करने लगा। तुम्हारे पूछे गए सवाल , और मेरे जबाब- हमारे रिश्ते को नया जन्म दे सकती है " ऐसी सम्भावनाओ से मैं जितना आशान्वित था उतना ही डरा हुआ भी कि " मेरे किसी जबाब से" यह आखिरी संवाद न बन कर रह जाये। फिर कही अफ़सोस मुझे पूरी जिंदगी ना चिढ़ाये।
मैं रिश्तों की शुरुआत जितनी कम अक़्ली से शुरू करता हूं, उस रिश्ते को बचाने में अपनी पूरी तरकीबे लगा देता हूँ। क्योकि मैं किसी भी रिश्ते को इतनी आसानी से नही जाने देता, क्योकि मैं अकेलेपन से डरता हूँ। पर पहली दफा तुमने हराया था मुझे किसी रिश्ते में सालों पहले, मेरे गलतियों को बिना बताये जाना कितना आसान था ना तुम्हारे लिये? तुमने मुझे इतना वक़्त भी नही दिया कि मैं समझ पाऊँ एक छोटी सी वजह।
खैर, इस घुटन से बाहर आने की जल्दी में, मैंने कमरे की खिड़कियों दरवाजे को खोल देना उचित समझा।पर कोई हवा इस कमरे में क्यूँ नही आ रही? कमरे के इस सन्नाटे में, मैं अपनी धड़कनों को साफ साफ सुन पा रहा था। मैं अपने अंदर के शोर को छुपाने के लिये कमरे के खालीपन को सांसों से भर लेना चाहा। और फिर इस खालीपन को किसी और तरकीब से भरने की कोशिश करने लगा। मैंने पास पड़े सिगरेट को जला लिया और मोबाइल में लिख लिख कर मिटाने लगा... ठीक हूँ, नही नही.... मैं बिलकुल अच्छा हूँ... नही ... तुम कैसी हो.... ओह्ह ये भी नही... hi जैसे कई शब्द उँगलियो और कीपैड के बीच जगह बना रहे थे। मैं कुछ और लिखना चाह रहा था, यह "कुछ और " मेरे कंठ के बीचों बीच अटका था। मैं कमरे के एक कोने में पड़े हुए कुर्सी पर जा कर बैठ गया। मैंने सोचा ये सवाल क्या तुमने भी अपने अंदर इतनी ही बेचैनी महसूस करते हुये पूछा होगा। तुम्हारी सहज तस्वीर उभर आयी, जिसमे तुम मुस्करा रही थी। मैं चिढ गया... मैं तुम्हे परेशान देखना चाहता था.. तुम्हारी मुस्कुराहट, तुम्हारी सहजता जो मुझे आकर्षित करती थी, अब उसी से चिढ़ने लगा। जानता हूँ, कई बुराईयो ने मेरे अंदर जगह बना लिया है, वह जगह जहाँ तुम्हारी मौजूदगी हमेशा होती थी। कोई जगह कभी खाली नही रहता, तुम्हारे जाने से , जन्म लिए उस खाली स्थान को भरने वाले कई चीजें आसपास मौजूद थी। और मैंने कभी उन्हें रोका नही... एक चिढ़, बेचैनी, उदासी, सिगरेट की कश, शराब की घुंट, अहंकार, नीरसता, सब वक़्त- बवक्त दरवाजा खटखटाते रहते है..
सिगरेट का कश लेते हुये अंततः मैंने तुम्हारे उस सवाल का कोई जबाब नही देने का सोचा। सिगरेट की आग फिल्टर के जितना करीब जा रही थी मैं उतना ही खुद को ठंडा महसुस करने लगा। मैं अब और असहज नही होना चाहता था, थक कर मैंने उस बोझ को हमेशा खत्म कर देने का चुनाव किया। मैंने तुम्हारा नम्बर ब्लॉक कर दिया था।
©गौरव गुप्ता
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