Tuesday, 8 August 2017

पटेलचेस्ट

लेक्चर समाप्त हो चूका है, क्लास के आखिरी बेंच पर सिर्फ तुम और मैं।
देखो ना क्लास के सन्नाटे में ए सी की हवा भी ज्यादा शोर कर रही है, लड़का कहता है।
लड़की, हां कह कर फिर बेंच पर सर टीका देती है।
तुम कब तक पूंजीवाद, समाजवाद की लड़ाई लड़ते रहोगे, प्रेम का कोई वाद नही होता, लड़की कहती है।

क्यों तुम्हे भी तो ये सब बाते अच्छी लगती थी,जब मैं प्रोफेसर से इन्ही बात पर लड़ता था।आज अगर वाद की लड़ाई न लड़ता तो शायद इस सन्नाटे में हमदोनों नही होते।

पर अपने लिए भी वक़्त निकलना किसी वाद ने नही सिखाया तुम्हे।

लड़का कहता है, नही।

दिल्ली की भागदौड़ तुम्हे शायद कभी पसंद नही आएगी, लड़की मायूस  होकर कहती है।
तुम्हे भी तो मैं हमेशा पसंद नही आता।लड़का मुस्कुरा देता है।

लड़की मोबाइल , कार की चाभी समेटती है, और चलने के लिए उठ पड़ती है।

लड़का मार्क्स का किताब झोले में डालता है, और साथ हो लेता है।

समय एक सा नही रहता, कल तक कोल्डड्रिंक्स अच्छी लग रही थी, अब तो कॉफी पीने को जी चाहता है।

लड़का कहता है, मुझे कल भी चाय अच्छी लगती थी,और आज भी चाय ही पीता हु।
शाम होने को होता है, लड़की कार स्टार्ट करती है, बन्द शीशे से बाय कहती है।
लड़का मुस्कुराकर  कार को जाते हुए देखता रहता है।
सचमुच मुझे दिल्ली में कुछ भी पसंद नही आता तुम्हारे सिवा। लड़का बुदबुदाता है, और चल पड़ता है पटेलचेस्ट की ओर , जहाँ छोटे से कमरे में इंतजार कर रहा होता है, घर की उम्मीद, नए सपने, सिद्धान्त, और एक विचारधारा।

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